सब इतना ख़ूबसूरत है,
तो सजने की क्या ज़रूरत है,
चाँदी के पानी में क्यों,
सच अगर सोने की मूरत है,
जब हमने ही बनाए हैं दिन,
क्यों कोई शुभ मुहूरत है,
हमीं आ रहे हैं फ़रेब में,
हर बार मगर, मजबूरन है?
सब इतना ख़ूबसूरत है,
तो सजने की क्या ज़रूरत है,
चाँदी के पानी में क्यों,
सच अगर सोने की मूरत है,
जब हमने ही बनाए हैं दिन,
क्यों कोई शुभ मुहूरत है,
हमीं आ रहे हैं फ़रेब में,
हर बार मगर, मजबूरन है?
तल्ख़ हो गया है दिल, तल्ख़ लोगों में रह के,
चलो देखें कैसा है दिल, कुछ दिन तन्हा रह के,
गाँव छोड़ आए थे सोच, शहर में ख़ुशी मिलेगी,
शहर अच्छा लगने लगे, चलो फिर आएँ गाँव रह के,
हक़ीक़त ठीक तो है, जाने क्यों बुरी लग रही,
हालात बुरे हों सच में, चलो आएँ अब वहाँ रह के,
कोई बात नहीं सुनता, किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता,
सच है क्या? चलो देख लें, कुछ दिन चुप रह के,
ये थकान, ये नाराज़गी, ये ग़ुबार जाने किस बात का है,
चलो ढूँढ लें, कुछ दिन अब ख़ुद से ही दूर रह के।
किसी को अच्छा बनाना है
तो किसी को बुरा होना पड़ेगा,
कोई अपनी मंज़िल पा सके
किसी को सपना खोना पड़ेगा,
दुनिया को मिल सकें
सिकंदर और चंद्रगुप्त,
किसी को अरस्तू, किसी को
विष्णुगुप्त होना पड़ेगा,
ले मैं तेरी दर-ओ-दिवार
बनता हूँ, जा, तू छू
ले आसमान, तुझे ये हक़
अदा करता हूँ,
जा, तू बीज दे वक़्त के
खेत में अपने सपनों
की फ़सलें, ले, मैं
तेरे लिए दरिया बनता हूँ,
सपना धरती का सच होने
के लिए, किसी को चाँद,
किसी को सूरज होना पड़ेगा।
धीमे-धीमे चल ज़िंदगी
गिने-चुने हैं ये पल
यूँ न खुले हाथ से
खर्च ज़िंदगी
हर साँस को ले कश की तरह
हर दिन को पी जाम की तरह
ना दे सकते, ना ले सकते
किसी से लम्हे उधार, ज़िंदगी
क्यों करना इंतज़ार
अपनी मर्ज़ी का होगा आलम
सपनों के जश्न का दिन होगा
सजा होगा त्योहार-सा बाज़ार
गीत मन का आज ही गा, ज़िंदगी
चल छोड़ ये करवटें
चल अब उठ खड़े हों
चल आ धूप का हाथ
पकड़ के टहल लें ज़रा
चल आ हवा पे सवार हो
के बादलों से खेल लें ज़रा
ये तो देख हमेशा ही तैयार
बस इनको तेरा इंतज़ार, ज़िंदगी
माना कि सारे लम्हे अपने नहीं
माना कि महसूल देते हैं सभी
पर जितने हैं पास अपने
उसमें बस होंगे रंग और सपने
इतना-सा कर ले चल करार, ज़िंदगी!
Kyon dil dukhaayein ye nahin wo nahin hai,
zindagi hai, isse badke aur kuch nahin hai.
ਆਪਣੇ ਸਮੇਂ ਦਾ ਤੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਇਨਸਾਨ ਸੀ,
ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆ ’ਚ ਤੇਰਾ ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਵੀ ਨਾ ਹਾਣ ਸੀ,
ਤੇਰੇ ਹੀ ਮੱਥੇ 'ਚ ਉੱਗਿਆ ਸੀ ਸੂਰਜ ਉਹ,
ਚੱਲਿਆ ਜਿਸਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੇਠ ਹਰ ਸਾਇੰਸਦਾਨ ਸੀ,
ਤੂੰ ਸਵਾਲ ਹੀ ਸਵਾਲ ਹਰ ਚੀਜ਼ ਤੇ ਚੁੱਕਦਾ ਰਿਹਾ,
ਨੀਹਾਂ ਤੇ ਨੀਹਾਂ ਹਰ ਵਿਸ਼ੇ ਦੀਆਂ ਪੁੱਟਦਾ ਰਿਹਾ,
ਤੂੰ ਚਾਨਣ ਚ ਪ੍ਰਤੱਖ ਦੀ ਪੜਤਾਲ ਕਰਦਾ ਸੀ,
ਤੂੰ ਹਨੇਰੇ ਚ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਦੇ ਖਿਆਲ ਤੇ ਖਿਆਲ ਕਰਦਾ ਸੀ,
ਤੂੰ ਤਰਕ ਨੂੰ ਗੁੜ੍ਹਤੀ ਦਿੱਤੀ, ਭੌਤਕੀ ਨੂੰ ਨਵੀਂ ਦਿਸ਼ਾ ਦਿੱਤੀ,
ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਗੋਹ ਨਾਲ ਤੱਕਿਆ, ਨੀਤੀ ਦਾ ਸਿੱਧਾਂਤ ਰੱਖਿਆ,
ਤੂੰ ਬੋਲੀ ਦਾ ਸ਼ਿੰਗਾਰ ਰਚਿਆ, ਤੂੰ ਕਹਾਣੀ ਕਵਿਤਾ
ਕਥਨ ਨੂੰ ਸਿਖਰ ਤੇ ਲਈ ਜਾਣ ਲਈ ਮਹਾਵਾਕ ਰਚਿਆ,
ਇੰਝ ਲਗਦਾ ਹੈ ਕਾਇਨਾਤ ਤੇ ਹਰ ਜ਼ਰਰੇ ਤੇ ਤੇਰੀ ਨਜ਼ਰ ਸੀ,
ਸੱਭ ਚੀਜ਼ ਦਾ ਵਿਧਾ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦਾ ਏਹਦੋਂ ਘੱਟ ਨਾ ਸਬਰ ਸੀ,
ਤੇ ਅੰਤ ਕਿੰਨੀਆਂ ਰਾਹਾਂ ਤੇ ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਛੱਡ ਗਿਆ,
ਗਿਆਨ ਦਾ ਗਿਆਨ ਕਿਵੇਂ ਹੋਵੇ ਦੌਲਤ ਪਾਸ ਜਹਾਨ ਛੱਡ ਗਿਆ!