बुद्धम शरणम गच्छामि

गौतम तुम्हारी पीड़ा कैसी होगी?

कैसा ही उसका ज्वर होगा?


कितना तुमको दिन रात वो दलती होगी?

कितना तुम्हारे अंदर कोताहल करती होगी?

कितना तुम्हें पल पल वो खाती होगी?

शायद दर्द से फटती तुम्हारी छाती होगी?

गौतम तुम्हारी पीड़ा कैसी होगी?


जैसी भी हो चलो जितनी भी हो,

तुम राजा थे या तुम साहसी थे,

तुम अपनी पीड़ा के समाधान के लिए

निकल पड़े वन में,

किया तुमने वही जो आया तुम्हारे मन में,


पर हम निर्धन क्या करें?

जिनके पास न महल न मोती 

वो अपनी पीड़ा का समाधान कैसे करें?


वो अपनी मुक्ति के लिए छोड़ जाएँ 

अपनी यशोधरा और राहुल को किसके आसरे?


बताओ गौतम तुम्हें अपना धर्म निभाना होगा,

मैं भिक्षु बन आया हूं तुम्हारे दर पे,

तुम्हें मेरे विचलित मन के संशय को मिटाना होगा,


बताओ गौतम बताओ,

जान जा रही है,

जल्दी आओ जहाँ भी हो

तुम्हें मुझे बचाना होगा!

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