पूछ के जाते तो क्या गौतम बुद्ध हो पाते?

 पूछ के जाते तो क्या गौतम बुद्ध हो पाते?

अपने प्रियजन से क्या कभी अनुमति पाते?


सब उनको वानप्रस्थ की त्रुटियां गिनाते,

सब उनको कर्तव्य और मोह में बांधना चाहते,

पूछ के जाते तो क्या गौतम बुद्ध हो पाते?


ज्यादा से ज्यादा होता भी तो क्या?

कहते उनसे रहो महल में ही दिन भर,

साथ में ये कुटिया में खोजो मार्ग जी भर कर,

राज छोड़ राजकुमार वन नहीं जाते,

पूछ के जाते तो क्या गौतम बुद्ध हो पाते?


और गौतम न इधर के न उधर के,

न सुख महल के अंदर, न शांति कुटिया के अंदर,

बस द्वंद्व द्वंद्व में ही शायद नष्ट हो जाते,

पूछ के जाते तो क्या गौतम बुद्ध हो पाते?

किसी न किसी को तो हर युग जाना होगा

 सब लोग ही कुछ न कुछ सहते हैं,

बस वो चुप रहते हम कह देते हैं,


वो मार के सब ख्याल जी लेते है,

हम है राह ढूंढ़ते जूझते रहते हैं,


पर मानव का पथ प्रदर्शन कैसे होगा?


गुट गुट के चुप चुप जीने वालों से?

या फिर लड़ते गिरते राह पाने वालों से?


क्या बुरा है जो मैं इस द्वंद्व में मारा जाऊं,

ये भी तो मुमकिन मुक्ति का मार्ग खोज लाऊं,


क्यों व्यर्थ मुझे रोकते हो,

क्यों व्यर्थ मुझे टोकते हो,


किसी न किसी को तो हर युग जाना होगा,

बन के बुद्ध जग के लिए लौट आना होगा!

बुद्धम शरणम गच्छामि

गौतम तुम्हारी पीड़ा कैसी होगी?

कैसा ही उसका ज्वर होगा?


कितना तुमको दिन रात वो दलती होगी?

कितना तुम्हारे अंदर कोताहल करती होगी?

कितना तुम्हें पल पल वो खाती होगी?

शायद दर्द से फटती तुम्हारी छाती होगी?

गौतम तुम्हारी पीड़ा कैसी होगी?


जैसी भी हो चलो जितनी भी हो,

तुम राजा थे या तुम साहसी थे,

तुम अपनी पीड़ा के समाधान के लिए

निकल पड़े वन में,

किया तुमने वही जो आया तुम्हारे मन में,


पर हम निर्धन क्या करें?

जिनके पास न महल न मोती 

वो अपनी पीड़ा का समाधान कैसे करें?


वो अपनी मुक्ति के लिए छोड़ जाएँ 

अपनी यशोधरा और राहुल को किसके आसरे?


बताओ गौतम तुम्हें अपना धर्म निभाना होगा,

मैं भिक्षु बन आया हूं तुम्हारे दर पे,

तुम्हें मेरे विचलित मन के संशय को मिटाना होगा,


बताओ गौतम बताओ,

जान जा रही है,

जल्दी आओ जहाँ भी हो

तुम्हें मुझे बचाना होगा!