उम्र भर की कमाई

वो इक लाश नहीं थी केवल,

उम्र भर की कमाई थी,


जिससे थी घर-आँगन की खुशियाँ,

वो तस्वीर है अब तन्हाई की,


जिसको देखे बिना पल जी नहीं था लगता,

उसकी नसीब न होगी अब परछाई भी.


वो दूर चला गया है इतना,

जहाँ जा नहीं सकती दुहाई भी,


वो दूर निकल गया है इतना,

जहाँ से नहीं देती आवाज़ कोई सुनाई भी,


आँखों में हैं बस यादों के दीपक,

हर रोशनी से है अब रुसवाई-सी,


दिल बंजर, ज़ुबान पत्थर हो गई है,

रूह हो गई है इक खाई-सी,


साँसें काँटे बन चुभने लगी हैं,

ज़िंदगी लगने लगी है अब हरजाई-सी,


तुमसे पहले मेरी चिता जलेगी,

सपनों में गूँज गई आवाज़ उस माई की!

इश्क़ बेहद पेचीदा है

 इश्क़ बेहद पेचीदा है, 

 ख़ुशबू-ख़ुशबू ज़ाहिर, 

 काँटे सब पोशीदा हैं। 


 जश्न-जश्न देख 

 सब लरज़ जाते हैं,

 पीछे तन्हाइयाँ रसीदाँ हैं। 


 ख़ाक हुई लैला, 

 मजनूँ हुआ कैस, 

 हर इक यही कहानी, 

 जितने इश्क़ क़सीदा हैं। 


 हम निकले हैं 

 जितनी बार इस राह पर, 

 हर बाज़ी हारी है, 

 नैना फिर भी 

 जाने क्यों ख़्वाबिदा हैं।

रूह लगाओगे तो दुनियाँ में नाम करोगे

कोड़ियों के लिए करोगे 

तो दो कोड़ी का काम करोगे,

रूह लगाओगे तो

दुनियाँ में नाम करोगे,


कल देखा मैंने दौलत को 

ठुकरा के चले हैं फ़कीर,

कहते हुए, करनी है बंदगी?

या वज़ीरों को सलाम करोगे?


सुबह को शबनम, रात को सितारे  

क्या क्या धरती सजाती नज़ारे,

तुम कभ कश लोगे सुबह का,

तुम कब दुपहर का जाम भरोगे,


ये फलक ये दश्त सब मौज में है,

न किसी तालाश ना किसी दोड़ में है,

बस के हैं तो है नज़ारे के लिए,

पाओगे सुकून जो इनसे नाता जोड़ लोगे!