धीमे-धीमे चल ज़िंदगी
गिने-चुने हैं ये पल
यूँ न खुले हाथ से
खर्च ज़िंदगी
हर साँस को ले कश की तरह
हर दिन को पी जाम की तरह
ना दे सकते, ना ले सकते
किसी से लम्हे उधार, ज़िंदगी
क्यों करना इंतज़ार
अपनी मर्ज़ी का होगा आलम
सपनों के जश्न का दिन होगा
सजा होगा त्योहार-सा बाज़ार
गीत मन का आज ही गा, ज़िंदगी
चल छोड़ ये करवटें
चल अब उठ खड़े हों
चल आ धूप का हाथ
पकड़ के टहल लें ज़रा
चल आ हवा पे सवार हो
के बादलों से खेल लें ज़रा
ये तो देख हमेशा ही तैयार
बस इनको तेरा इंतज़ार, ज़िंदगी
माना कि सारे लम्हे अपने नहीं
माना कि महसूल देते हैं सभी
पर जितने हैं पास अपने
उसमें बस होंगे रंग और सपने
इतना-सा कर ले चल करार, ज़िंदगी!
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