मजबूरन?

सब इतना ख़ूबसूरत है,

तो सजने की क्या ज़रूरत है,


चाँदी के पानी में क्यों,

सच अगर सोने की मूरत है,


जब हमने ही बनाए हैं दिन,

क्यों कोई शुभ मुहूरत है,


हमीं आ रहे हैं फ़रेब में,

हर बार मगर, मजबूरन है?

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