उम्र भर की कमाई

वो इक लाश नहीं थी केवल,

उम्र भर की कमाई थी,


जिससे थी घर-आँगन की खुशियाँ,

वो तस्वीर है अब तन्हाई की,


जिसको देखे बिना पल जी नहीं था लगता,

उसकी नसीब न होगी अब परछाई भी.


वो दूर चला गया है इतना,

जहाँ जा नहीं सकती दुहाई भी,


वो दूर निकल गया है इतना,

जहाँ से नहीं देती आवाज़ कोई सुनाई भी,


आँखों में हैं बस यादों के दीपक,

हर रोशनी से है अब रुसवाई-सी,


दिल बंजर, ज़ुबान पत्थर हो गई है,

रूह हो गई है इक खाई-सी,


साँसें काँटे बन चुभने लगी हैं,

ज़िंदगी लगने लगी है अब हरजाई-सी,


तुमसे पहले मेरी चिता जलेगी,

सपनों में गूँज गई आवाज़ उस माई की!

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