साथ थे जब तक सब सही था

साथ थे जब तक सब सही था,

बात की जाने की तो 

जैसे कभी रिश्ता ही नहीं था,


क्या क्या नहीं कहा उन्होंने

एक खता के लिए, जैसे किया 

कभी कुछ भी ना सही था,


उन्स की तम्मना तो उनसे कभी भी रही,

पर इस तरह बेइज्जत करेंगे,

हमने कभी सोचा नहीं था,


सुबह शाम जिसका हम परचम लेकर चले,

वही हमारी आबरू मिट्टी में मिला दे,

ऐसे तो पहले देखा नहीं था,


शायद उनका अपना यही असूल है,

जब तक कोई साथ चले तो ठीक,

जब दूर जाए तो ना छोड़ो उसे कहीं का,


हमारी खता की वक्त हमको सजा दे,

बस कभी उनको रोक के इतना पूछे,

क्या इतना संग दिल होना ज्यादा नहीं था? 

चलो ये कोई नई बात तो नहीं

किसी की बेवकूफियां 

और नुकसान हमारा हो,

चलो ये कोई नई बात तो नहीं,

जो भी हालात हैं उसी में गुजारा हो,


जो अपना अपना हमें कहते रहे,

कभी हाथ मिलाते रहे कभी गले लगाते रहे,

आज जो हो गया है उनकी 

मतलब परस्ती का सच जाहिर,

चलो ऐसे लोगों से अब किनारा हो,


हर सच की हमेशा कीमत होती है,

हर हुकूमत सवाल करने वालों को सजा देती है,

हमने दोनों ही गुनाह एक साथ कर दिए,

क्यों अब वो मिटाने पे आए हमें,

क्यों कोई भी दर्दमंद अब हमारा हो,


मोहब्बतों के गिलास में पीती है मतलब का जाम दुनिया,

चांदी के पन्नों में रख के बेचती है जहर की पुड़िया,

कितना कोई अपने आपको ऐसे में बचाए,

अच्छा नहीं था एक दो दोस्त बाकी सब से दूर रहना,

चलो फिर से अब वही पैराहन हमारा हो।